CM को काला झंडा दिखाने से पहले ही 4 कांग्रेस जिला पंचायत सदस्य नजरबंद, शिवरीनारायण में सियासी हड़कंप

जांजगीर-चांपा / शिवरीनारायण
छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री विष्णु देव साय के शिवरीनारायण आगमन से ठीक पहले जांजगीर-चांपा जिले की सियासत गरमा गई है। मुख्यमंत्री को काला झंडा दिखाने की योजना बना रहे कांग्रेस के चार जिला पंचायत सदस्यों को पुलिस ने उनके घर में ही नजरबंद कर दिया। इस कार्रवाई के बाद जिले का राजनीतिक पारा चढ़ गया है।
जानकारी के अनुसार, जिला पंचायत के चार सदस्य – ज्योति किशन कश्यप (क्षेत्र क्रमांक-4, खैरताल), नेहा रामचरण साहू (क्षेत्र क्रमांक-5, तुस्मा), लोकेश राठौर (क्षेत्र क्रमांक-1, जांजगीर) और प्रीति दिव्य (क्षेत्र क्रमांक-7, भदरा) ने मुख्यमंत्री के शिवरीनारायण दौरे के दौरान काला झंडा दिखाकर विरोध प्रदर्शन करने की योजना बनाई थी।
जिला पंचायत सदस्यों का आरोप है कि 16वें वित्त आयोग की राशि के वितरण में कांग्रेस समर्थित जिला पंचायत सदस्यों के साथ खुला भेदभाव किया जा रहा है और उन्हें उनके अधिकारों से वंचित रखा जा रहा है। सदस्यों का कहना है कि वित्त आयोग की राशि हर क्षेत्र के विकास के लिए होती है, लेकिन सत्तापक्ष के दबाव में विपक्षी सदस्यों के क्षेत्रों में राशि नहीं दी जा रही है या कम दी जा रही है। इसी बात से नाराज होकर उन्होंने लोकतांत्रिक तरीके से विरोध करने का फैसला किया था।
इस योजना की भनक लगते ही जिला पुलिस और खुफिया तंत्र सक्रिय हो गया। पुलिस ने एहतियात के तौर पर सुबह करीब 9 बजे ही चारों सदस्यों को उनके निवास स्थान पर ही नजरबंद कर दिया। सूत्रों के अनुसार समाचार लिखे जाने तक यानी देर शाम तक नजरबंदी जारी थी, हालांकि बाद में मिली जानकारी के अनुसार उन्हें रात करीब 9 बजे रिहा किया गया। इस तरह लगभग 12 घंटे तक चारों जनप्रतिनिधि अपने ही घर में कैद रहे।
बताया जा रहा है कि चारों सदस्यों की योजना थी कि किसी तरह घर से निकलकर कार्यक्रम स्थल तक पहुंचा जाए और मुख्यमंत्री के सामने काला झंडा दिखाया जाए। अगर कार्यक्रम स्थल पर पहुंचना संभव न हो पाया तो घर पर ही काला झंडा दिखाकर सांकेतिक विरोध दर्ज कराया जाए। लेकिन पुलिस की मुस्तैदी के चलते उनकी एक भी योजना कामयाब नहीं हो पाई।
इधर, इस पूरे मामले ने राजनीतिक गलियारों में नई बहस छेड़ दी है। कांग्रेस खेमे में इसे लेकर भारी नाराजगी देखी जा रही है। कांग्रेस नेताओं का कहना है कि यह लोकतंत्र में आवाज को दबाने की कोशिश है और भाजपा सरकार पुलिस बल का दुरुपयोग कर रही है। एक निर्वाचित जनप्रतिनिधि को अपनी बात रखने से रोकना तानाशाही है।
वहीं, सत्तापक्ष और पुलिस प्रशासन का तर्क है कि मुख्यमंत्री का दौरा एक संवेदनशील कार्यक्रम है और कानून-व्यवस्था बनाए रखना उनकी प्राथमिकता है। किसी भी अप्रिय स्थिति से बचने के लिए यह निवारक कार्रवाई की गई है।
हालांकि राजनीतिक जानकारों की मानें तो चुनावी मौसम में इस तरह के दांव-पेंच नए नहीं हैं। काला झंडा दिखाना विपक्ष का एक पुराना विरोध का तरीका रहा है, और सत्ता पक्ष द्वारा उसे रोकना भी एक रणनीति का हिस्सा माना जाता है। फिलहाल इस नजरबंदी की घटना के बाद जांजगीर-चांपा जिले में सियासी चर्चाएं तेज हो गई हैं और कांग्रेस इस मुद्दे को बड़ा बनाने की तैयारी में है।
