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रंग पंचमी पर पंतोरा में अनोखी लट्ठमार होली: कुंवारी कन्याएं अभिमंत्रित बांस की छड़ियों से निभाती हैं सदियों पुरानी परंपरा

जांजगीर-चांपा जिले में रंग पंचमी के अवसर पर एक अनोखी और आस्था से जुड़ी परंपरा देखने को मिलती है, जिले के पंतोरा गांव में होली के पांचवें दिन यानी रंग पंचमी पर हर साल विशेष तरीके से लट्ठमार होली खेली जाती है, इस परंपरा की सबसे खास बात यह है कि यहां गांव की कुंवारी कन्याएं अभिमंत्रित बांस की छड़ियों से लोगों को स्पर्श करती हैं. यह आयोजन मां भवानी मंदिर परिसर में होता है, जहां ग्रामीण बड़ी संख्या में एकत्रित होकर इस अनोखी परंपरा का हिस्सा बनते हैं, ग्रामीणों की मान्यता है कि कुंवारी कन्याओं द्वारा अभिमंत्रित बांस की छड़ी का स्पर्श मिलने से बीमारियां दूर होती हैं और गांव में सुख-समृद्धि बनी रहती है.

गौरतलब है कि पूरे देशभर में 4 मार्च को होली का त्योहार धूमधाम से मनाया गया, जबकि 8 मार्च को रंग पंचमी मनाई जाएगी, वहीं जांजगीर-चांपा जिला मुख्यालय से लगभग 50 किलोमीटर दूर कोरबा रोड पर स्थित पंतोरा गांव में होली का त्योहार रंग और गुलाल के साथ मनाया जाता है, लेकिन यहां की असली पहचान होली के पांचवें दिन खेली जाने वाली लट्ठमार होली है, राधा के गांव बरसाना की तर्ज पर पंतोरा में भी यह परंपरा आदिकाल से चली आ रही है, स्थानीय भाषा में इसे डंगाही होली कहा जाता है. इस दिन गांव की कुंवारी कन्याएं मंदिर में अभिमंत्रित बांस की छड़ियों से लोगों को स्पर्श करती हैं, ग्रामीणों की आस्था है कि इस छड़ी का आशीर्वाद मिलने से बीमारियां दूर होती हैं और जीवन में खुशहाली आती है, यही कारण है कि इस पर्व का पंतोरा गांव में विशेष महत्व है और लोग इस परंपरा का सम्मान करते हुए पूरे उत्साह के साथ इसमें शामिल होते हैं.

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लट्ठमार होली की इस परंपरा के बारे में स्थानीय निवासी राजेश तिवारी बताते हैं कि बलौदा ब्लॉक के पंतोरा गांव में स्थित मां भवानी मंदिर परिसर में हर साल रंग पंचमी के दिन बड़ी संख्या में ग्रामीण एकत्रित होते हैं, यहां लट्ठमार होली की यह परंपरा वर्षों से चली आ रही है. उन्होंने बताया कि इस परंपरा की शुरुआत रंग पंचमी के एक दिन पहले से ही हो जाती है, रंग पंचमी की पूर्व संध्या पर ग्रामीण कोरबा जिले के मड़वारानी के जंगल से विशेष बांस की छड़ी लेकर आते हैं, इस छड़ी को चुनने की भी एक खास परंपरा है- जिस बांस की छड़ी को एक ही कुल्हाड़ी के वार में काटा जाता है, उसी छड़ी को इस पर्व के लिए चुना जाता है, उसके बाद उस बांस की छड़ी की विधि-विधान से पूजा की जाती है.

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रंग पंचमी के दिन मां भवानी मंदिर में उस छड़ी की पूजा-अर्चना की जाती है और यह कामना की जाती है कि गांव में किसी प्रकार की बीमारी न फैले और सभी ग्रामीण सुखी व स्वस्थ रहें, मंदिर में माता की पूजा के बाद कुंवारी कन्याओं द्वारा उस अभिमंत्रित बांस की छड़ी को पांच बार मां भवानी को स्पर्श कराया जाता है, इसके बाद मंदिर परिसर में विराजमान अन्य देवी-देवताओं को भी उसी छड़ी से स्पर्श कराया जाता है। इसके बाद यह छड़ी कुंवारी कन्याओं को दी जाती है.

मंदिर की पूजा के पश्चात गांव के बैगा (पंडित) द्वारा वह छड़ी कुंवारी कन्याओं को सौंप दी जाती है, इसके बाद कन्याएं मंदिर परिसर के बाहर खड़े ग्रामीणों, बच्चों और बुजुर्गों को उस छड़ी से मारते ( सांकेतिक स्पर्श) है, यहां की सबसे खास बात यह है कि इस छड़ी का स्पर्श पाने के लिए लोग खुद आगे आते हैं, यहां तक कि रास्ते से गुजरने वाले राहगीर भी इस परंपरा में शामिल होने के लिए रुक जाते हैं और छड़ी का स्पर्श ग्रहण करते हैं, इसे कोई भी बुरा नहीं मानता, बल्कि इसे आशीर्वाद के रूप में स्वीकार किया जाता है.

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इस दौरान मंदिर परिसर में रंग-गुलाल के साथ उत्सव का माहौल बन जाता है, ग्रामीण एक-दूसरे को रंग लगाते हैं और पूरे गांव में खुशियों का माहौल दिखाई देता है, ग्रामीणों का मानना है कि जब से यह परंपरा शुरू हुई है, तब से गांव में किसी प्रकार की गंभीर बीमारी नहीं फैली है, इसलिए यह परंपरा केवल एक त्योहार नहीं, बल्कि गांव की आस्था और विश्वास का प्रतीक बन चुकी है.पंतोरा गांव के लोग इस परंपरा को अपनी सांस्कृतिक पहचान मानते हैं और पीढ़ी दर पीढ़ी इसे संजोकर आगे बढ़ा रहे हैं, ग्रामीणों का कहना है कि आने वाली पीढ़ियां भी इसी तरह इस अनोखी परंपरा को निभाती रहेंगी और मां भवानी की कृपा पूरे गांव पर बनी रहेगी.

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