जांजगीर चांपा

जांजगीर: 2 वर्ष 7 माह के आयान ने “इंडिया बुक ऑफ रिकार्ड” मे दर्ज कराया अपना नाम

बलौदा/ जांजगीर-चांपा –सुरेन्द्र सोनी

बचपन की अटखेलिया जीवन को यादगार बनाने के लिए होती है। जो आगे अपनी जीवन के लिए सहायक होती है बचपन मे जो सीख हमे मिलती है वह उम्र भर काम आती है। छोटे से इशारे पर बच्चें क्या बड़े-बुजुर्ग भी ख़ुश हो जाते हैं। बदलते परिदृष्य में सोशल नेटवर्किंग ने अपनी जगह हर घरों में बनाई है , डॉ रमेश स्वर्णकार ने अपने छोटे-से 2 वर्ष 7 माह प्रतिभावान पोते आयन के प्रतिभा से हर्षित होकर वाट्स अप पर फ़ोटो शेयर किया था | इस छोटे-से बालक का कोई जवाब नहीं हैं । दो-वर्ष सात माह के इस बच्चें आयन का चयन इंडिया बुक ऑफ रिकार्ड के लिए किया गया हैं |

इंडिया बुक ऑफ रिकॉर्ड्स में शामिल होकर स्वर्णकार समाज का नाम रौशन कर दिया हैं

डॉक्टर रमेश कुमार स्वर्णकार जांजगीर चाम्पा जिले अकलतरा ब्लाक के कोटमी सुनार गाँव से है दादी गृहणी है उनकी पुत्रवधु उषा स्वर्णकार झारसुगुड़ा के वेदांता में प्रशासनिक अधिकारी है और पुत्र आकाश स्वर्णकार बैंक में कार्यरत है।उनके साथ ही पूरा परिवार झारसुगुड़ा में रहते है। डॉ रमेश स्वर्णकार ने बताया कि छोटे-से उम्र में पोते आयन अपने मम्मी पापा के कार्य मे जाने पर आयन हमारी देखभाल में रहता है ,उसकी प्रतिभा पहले से ही दिखाई दे रही थी।जिससे बच्चें ने प्रतिदिन की हमारी दिनचर्या को अपना लिया हम दादा दादी बच्चे की हरएक गतिविधियों को फोटो वीडियो में सहेजने लगे तभी पता चला कि इंडिया बुक ऑफ रिकार्ड ऐसे प्रतिभावान बच्चो की प्रतियोगिता ले रहा है जहाँ हमने उसकी फोटो वीडियो इंडिया बुक ऑफ रिकॉर्ड्स में शेयर किया जिसमे आयन का चयन हुआ और स्वर्णकार समाज का नाम रौशन कर दिया हैं।
26 फरवरी, 2019 में जन्में आयन का अभी उम्र दो वर्ष सात माह में ही अपनी सभ्यता ,संस्कार और प्रतिभा का धनी होने चला , जाहिर है सभ्यता ही संस्कार की पूंजी हैं। छोटे से उम्र में आयन 5 तरह के जानवरों की आवाज पहचान करना,शरीर के 11 अंग को पहचान कर बताया,5 तरह के रंगों की पहचान ,5 प्रकार के फल की पहचान, 5 प्रकार के फास्ट फुड को पहचान करना, 3 चक्की वाली सायकल, बेबी स्कूटर चलाना, ए से लेकर जेड तक और एक से लेकर दस तक कि गिनती करना यह सब कार्य गतिविधि को वाट्सएप में भेजने पर इंडिया बुक ऑफ रिकॉर्ड में नाम दर्ज किया गया।कामकाजी दंपति के बच्चें अपने परिवार का संस्कार पाकर बहुत ही व्यव्हारिक और प्रतिभा सम्पन्न होते हैं। आत्मविश्वास और सभ्यता इन्हें सीखाने की आवश्यकता नहीं पड़ती |
अपने मम्मी-पापा और दादा-दादी के कार्य को देखकर सीख लेते हैं,यही सब गुण आयन में समाहित हैं। हमारे कनोजिया स्वर्णकार समाज में भी यह बनी बनाई धारणा हैं कि कामकाजी माता पिता अपने बच्चों का पालन-पोषण तो कर लेती हैं, लेकिन उन्हें आगे बढ़ने के लिए पर्याप्त प्रोत्साहन का समय नही दे पाते।अब यह अवधारणा टूट रही हैं।माता पिता ही नहीं बल्कि दादा-दादी और नाना-नानी भी बच्चों के बारें में सकारात्मक पहलूओं को सोचकर बढ़ावा दे रहे हैं। आयन बेटा को भी जीवन के प्रति व्यव्हारिक दृष्टिकोण स्वर्णकार परिवार से विरासत में मिला हैं।आज यही नजरिया उन्हें अपनी प्रतिभा बेहतर करने की क्षमता प्रदान कर रहा हैं।बहुत बहुत बधाई स्वर्णकार समाज को।

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