कोरबाछत्तीसगढ़

धान बेचने टोकन नहीं कटने से परेशान किसान ने पिया जहर, अस्पताल पहुंची सांसद ज्योत्सना महंत

कोरबा। जिले में धान बेचने के लिए टोकन नहीं कटने से परेशान आदिवासी किसान ने आत्महत्या की कोशिश की है। जहर सेवन के बाद किसान को चिंताजनक हालत में मेडिकल कालेज अस्पताल में भर्ती कराया गया है। बताया जा रहा है कि पीड़ित किसान ने कलेक्टर जनदर्शन में भी अपनी शिकायत की थी, लेकिन उसकी समस्या का निराकरण नही होने से हताश होकर उसने ये आत्मघाती कदम उठाया। वहीं घटना की जानकारी के बाद सांसद ज्योत्सना महंत मौके पर पहुंची और उन्होने सरकारी सिस्टम पर सवाल खड़े करते हुए गंभीर आरोप लगाये है।

गौरतलब है कि छत्तीसगढ़ में धान खरीदी का कार्य अब अंतिम दौर में है। वहीं दूसरी तरफ प्रदेश में अब भी कई जिलों में किसान धान बेचने को लेकर परेशान है। ताजा मामला कोरबा जिले का है, यहां हरदीबाजार तहसील के ग्राम कोरबी-धतुरा में रहने वाले किसान सुमेर सिंग गोण ने आत्महत्या की कोशिश की है। बताया जा रहा है किसान ने धान बेचने के लिए बकायदा पंजीयन कराया था। धान खरीदी शुरू होने के बाद से ही वह टोकन लेने का प्रयास कर रहा था। लेकिन उसे टोकन नही मिल सका, जिससे वह अपना 68 क्विंटल धान बेच नही पा रहा था।

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इस समस्या से परेशान होकर उसने 29 दिसंबर 2025 को कलेक्टर जनदर्शन में भी अपनी शिकायत दर्ज करायी थी। लेकिन कलेक्टर के निर्देश के बाद भी जमीनी स्तर पर अधिकारियों ने किसान की समस्या का निराकरण नहीं किया जा सका। जिससे परेशान होकर किसान सुमेर सिंग गोण ने रविवार की रात कीटनाशक का सेवन कर लिया। जहर सेवन के बाद हालत बिगड़ने पर आनन फानन में किसान को मेेडिकल कालेज अस्पताल में लाकर भर्ती कराया गया। जहां समय पर उपचार मिल जाने से उसकी जान बचा ली गयी है।

सांसद ज्योत्सना महंत ने उठाये सवाल

धान नही बेच पाने से परेशान किसान के जहर सेवन की जानकारी मिलने के बाद कोरबा सांसद ज्योत्सना महंत मेडिकल कालेज अस्पताल पहुंची। यहां उन्होने पीड़ित किसान से मिलकर उसका हाल जाना और उसकी समस्या जानने का प्रयास किया। पीड़ित किसान से मिलने के बाद सांसद ज्योत्सना महंत ने बताया कि वे लगातार फील्ड में घुम रही है, जहां किसान ऐसी समस्याओं से परेशान है। किसान अपना धान बेचने के लिए चक्कर लगा रहे है, बावजूद इसके किसानों को समय पर टोकन नही मिल पा रहा है। उन्होने सरकारी सिस्टम पर सवाल उठाते हुए कहा कि सरकार की इस नीति का खामियाजा आज किसान भुगत रहे है, और परेशान किसान अपनी जान देने को विवश है।

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