छत्तीसगढ़

छत्तीसगढ़ में हरतालिका तीज की धूम : सुहागिनों ने निर्जला व्रत रखकर भगवान शिव और देवी पार्वती से मांगी पति की लंबी आयु

रायपुर। छत्तीसगढ़ में तीजा यानी हरतालिका तीज का मतलब सिर्फ एक कठिन व्रत और भगवान शिव-पार्वती की पूजा नहीं है। यह वह पर्व है, जब शादीशुदा बेटियों के मायके लौटने से घर-आंगन में रौनक आती है। मां-बेटी के स्नेह, बहनों की हंसी-मजाक और वर्षों से चली आ रही लोकपरंपराओं के बीच तीजा छत्तीसगढ़ की संस्कृति का खास हिस्सा बन जाता है। महिलाएं पति की लंबी उम्र, सुखी दांपत्य जीवन और परिवार की खुशहाली की कामना से व्रत रखती हैं। कई महिलाएं इस दिन 24 घंटे से भी अधिक समय तक निर्जला व्रत रखती हैं। वहीं अविवाहित युवतियां मनचाहे वर की कामना से तीजा का व्रत करती हैं।

छत्तीसगढ़ी तीजा की सबसे खास परंपराओं में कड़ू भात शामिल है। तीजा पर्व की शुरुआत कड़ू भात से होती है, इसके बाद महिलाएं व्रत का संकल्प लेकर दिनभर पूजा-पाठ और धार्मिक अनुष्ठानों में शामिल होती हैं। गांवों से लेकर शहरों तक तीजा के दौरान महिलाओं के मायके आने की परंपरा आज भी काफी मजबूत है। यही वजह है कि छत्तीसगढ़ में तीजा को केवल धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि बेटियों और मायके के रिश्ते को मजबूत करने वाला लोकपर्व भी माना जाता है।

साल 2026 में हरतालिका तीज 14 सितंबर को मनाई गई, खास बात यह रही कि इसी दिन से गणेश चतुर्थी का पर्व भी शुरू हुआ। लंबे समय बाद ऐसा संयोग देखने को मिला, जिसने इस दिन को धार्मिक दृष्टि से और भी खास बना दिया। हर साल हरतालिका तीज भाद्रपद शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को मनाई जाती है। वर्ष 2026 में तृतीया तिथि 13 सितंबर की सुबह 7:08 बजे शुरू होकर 14 सितंबर की सुबह 7:06 बजे तक रही। उदया तिथि के महत्व के चलते हरतालिका तीज का व्रत 14 सितंबर को रखा गया।

धार्मिक मान्यता के अनुसार माता पार्वती ने भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त करने के लिए कठोर तपस्या की थी। इसी तपस्या से हरतालिका तीज के व्रत की परंपरा जुड़ी मानी जाती है। विवाहित महिलाएं पति की लंबी उम्र और सुखी दांपत्य जीवन की कामना से यह व्रत रखती हैं। वहीं अविवाहित युवतियां मनचाहे वर की प्राप्ति के लिए भगवान शिव और माता पार्वती की आराधना करती हैं।

हरतालिका तीज के दिन महिलाएं सुबह स्नान के बाद व्रत का संकल्प लेती हैं। इसके बाद भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा की जाती है। कई स्थानों पर मिट्टी या बालू से शिव-पार्वती की प्रतिमा बनाकर पूजन करने की परंपरा भी है। पूजा के दौरान माता पार्वती को सुहाग की सामग्री, फूल और फल अर्पित किए जाते हैं। भगवान शिव को बेलपत्र, धतूरा और अन्य पूजन सामग्री चढ़ाई जाती है। इसके बाद हरतालिका तीज की कथा का श्रवण या पाठ किया जाता है और आरती की जाती है।

हरतालिका तीज का व्रत कठिन व्रतों में शामिल माना जाता है। कई महिलाएं निर्जला व्रत रखती हैं, यानी पूरे दिन अन्न और जल का सेवन नहीं करतीं। हालांकि व्रत की परंपरा परिवार और क्षेत्र के अनुसार अलग-अलग हो सकती है। स्वास्थ्य संबंधी परेशानी होने पर कठोर निर्जला व्रत रखने से बचना चाहिए। व्रत के दौरान अपनी स्वास्थ्य स्थिति के अनुसार ही निर्णय लेना उचित है।

हरतालिका तीज

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार हरतालिका तीज पर भगवान शिव की पूजा करने के बाद शिव चालीसा का पाठ करने से आर्थिक परेशानियां दूर होने और आर्थिक स्थिति मजबूत होने की कामना की जाती है। ज्योतिषीय मान्यता के अनुसार इस दिन भगवान शिव को आक के पांच फूल अर्पित करना भी शुभ माना जाता है। मान्यता है कि इससे आर्थिक समृद्धि की कामना पूरी हो सकती है।

हरतालिका तीज पर दांपत्य जीवन में प्रेम और खुशहाली की कामना से भगवान गणेश की पूजा करने की भी मान्यता है। इसके लिए गणेश जी की पंचोपचार विधि से पूजा कर उन्हें दूर्वा और मालपुए का भोग अर्पित किया जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार ऐसा करने से पति-पत्नी के बीच प्रेम और सुख-शांति की कामना की जाती है।

छत्तीसगढ़ में तीजा की सबसे बड़ी खासियत यही है कि यह पर्व पूजा-पाठ से आगे बढ़कर रिश्तों और परंपराओं का उत्सव बन जाता है। मायके आई बेटियों के लिए यह बचपन की यादों को फिर से जीने का मौका होता है, तो माता-पिता के लिए बेटी के घर आने की खुशी का दिन। कड़ू भात से शुरू होने वाली परंपरा, शिव-पार्वती की आराधना, गौर-गौरी की प्रतीक पूजा और विसर्जन के बाद व्रत खोलने तक तीजा छत्तीसगढ़ की संस्कृति में अपनी अलग पहचान बनाए हुए है।

Related Articles

Leave a Reply