छत्तीसगढ़

सुहागिनें रखेंगी वट सावित्री का व्रत : पति की लम्बी आयु के लिए करेंगी कामना, जानें पौराणिक महत्व

वट सावित्री व्रत सुहागिन महिलाओं का एक महत्वपूर्ण पर्व है, जो पति की दीर्घायु और सुखी वैवाहिक जीवन के लिए मनाया जाता है। यह व्रत ज्येष्ठ माह की अमावस्या को मुख्य रूप से मनाया जाता है। इसके पीछे सावित्री और सत्यवान की कहानी जुड़ी हुई है।

मद्रदेश के राजा अश्वपति की पुत्री सावित्री बहुत रूपवती, गुणवान और बुद्धिमान थी। विवाह योग्य होने पर उसने स्वयं वर चुना सत्यवान, जो साल्वदेश के अंधे राजा द्युमत्सेन का पुत्र था। लेकिन नारद मुनि ने बताया कि, सत्यवान अल्पायु है और विवाह के एक वर्ष बाद ही उसकी मृत्यु हो जाएगी। 

सावित्री ने सत्यवान से ही किया विवाह 
फिर भी सावित्री ने सत्यवान से ही विवाह किया। विवाह के बाद वह सास-ससुर की सेवा और पति की सेवा में लीन रही। जब सत्यवान की मृत्यु का दिन आया, तो सावित्री भी उसके साथ जंगल गई। सत्यवान लकड़ी काटते समय बेहोश होकर गिर पड़ा और उसके प्राण निकल गए। तभी यमराज उसके प्राण लेने आए। सावित्री ने यमराज से विनती की और अपने पतिव्रत धर्म, ज्ञान और तर्क से उन्हें प्रसन्न कर लिया।

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सावित्री ने मांगे तीन वरदान
यमराज सावित्री की निष्ठा, बुद्धिमत्ता और पति-प्रेम से इतने प्रसन्न हुए कि, उन्होंने उसे तीन वरदान मांगने को कहा। सावित्री ने पहले सास-ससुर की आँखों की ज्योति और राज्य वापस मांगा, फिर अपने 100 पुत्रों का वरदान मांगा। यमराज ने तथास्तु कह दिया।

सावित्री ने अपने पतिव्रत धर्म और दृढ़ निश्चय से मृत्यु को भी हरा दिया 
जब यमराज ने कहा कि, तुम्हारे पति तो मर चुके हैं, 100 पुत्र कैसे होंगे? तब सावित्री ने कहा – पति के बिना पत्नी को पुत्र कैसे हो सकते हैं? यमराज सावित्री के तर्क से बंध गए और सत्यवान को जीवनदान दे दिया। इस तरह सावित्री ने अपने पतिव्रत धर्म और दृढ़ निश्चय से मृत्यु को भी हरा दिया और अपने पति को पुनर्जीवित कर लिया।

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वट वृक्ष की क्यों की जाती हैं पुजा 
कथा के अनुसार,, सावित्री ने सत्यवान को वट वृक्ष के नीचे ही पुनर्जीवित किया था। वट वृक्ष को लंबी आयु और अमरत्व का प्रतीक माना जाता है। इसकी जड़ें गहरी और शाखाएँ फैली हुई होती हैं, जो पति-पत्नी के अटूट बंधन का प्रतीक हैं। इसी कारण इस व्रत में वट वृक्ष की पूजा की जाती है और उसे 108 बार परिक्रमा की जाती है।

यह व्रत स्त्री के प्रेम, त्याग, धैर्य और समर्पण का प्रतीक
सावित्री को आदर्श पतिव्रता नारी माना जाता है। यह व्रत स्त्री के प्रेम, त्याग, धैर्य और समर्पण का प्रतीक है। ऐसी मान्यता है कि इस व्रत को रखने से पति की आयु बढ़ती है और वैवाहिक जीवन में सुख-शांति आती है। सावित्री ने मृत्यु जैसे बड़े संकट को भी अपने संकल्प से टाल दिया, इसलिए यह व्रत सभी प्रकार के संकटों से रक्षा करने वाला माना जाता है। यह व्रत महिलाओं को कठिन परिस्थितियों में भी धैर्य और आत्मबल बनाए रखने की प्रेरणा देता है।

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सुहागिन महिलाएं 16 श्रृंगार करके वट वृक्ष की करती हैं पुजा 
व्रत के दिन सुहागिनें 16 श्रृंगार करके वट वृक्ष के पास जाती हैं। कच्चे सूत को वट वृक्ष में 7 या 108 बार लपेटकर परिक्रमा करती हैं। सावित्री-सत्यवान और यमराज की कथा सुनती हैं। पूजा के बाद वट वृक्ष के पत्ते को अपने बालों में लगाती हैं और पति के चरण स्पर्श करके आशीर्वाद लेती हैं। वट सावित्री व्रत सिर्फ एक धार्मिक परंपरा नहीं, बल्कि स्त्री शक्ति, प्रेम और संकल्प का उत्सव है। सावित्री ने यह सिद्ध कर दिया कि सच्चे प्रेम और निष्ठा के सामने मृत्यु भी हार मान लेती है।

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