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छत्तीसगढ़ का फ्रेंडशिप डे भोजली: हरियाली और उन्नति का त्योहार, मितान बनाने की अनोखी परंपरा

जांजगीर चांपा: छत्तीसगढ़ में दोस्ती का एक अनोखा त्योहार ‘मितान तिहार’ जिसे हम ‘भोजली’ नाम से भी जानते हैं, मनाया जाता है. इस त्योहार की शुरुआत नागपंचमी के दिन से हो जाती है. रक्षाबंधन के बाद यह भोजली त्योहार पूरे छत्तीसगढ़ में मनाया जाता है. जिस तरह से नवरात्रि के दौरान कलश की स्थापना कर उसमें गेहूं के बीज लगाए जाते हैं, ठीक उसी तरह से भोजली त्योहार के लिए भी गेहूं के बीज उगाए जाते हैं. बीज लगाने के 9 दिन बाद उसकी पूजा अर्चना कर भादो के पहले दिन उसका विसर्जन किया जाता है. विसर्जन के दौरान गेहूं के अंकुरण को लोग अपने कानों पर लगाते हैं.

मान्यता है कि भोजली त्योहार पर गेहूं के अंकुरण को जब हम दूसरों को कानों पर लगाने के लिए देते हैं, तो उसे हम अपना मितान यानी दोस्त बनाते हैं. इस दोस्ती की परंपरा को निभाए रखने का एक दूसरे को वचन भी देते हैं. भोजली त्योहार के दिन छोटे-बड़ों का आशीर्वाद लेते हैं, समाज में प्रेम और भाईचारा बनाए रखने का संकल्प भी लोग भोजली त्योहार के दौरान उठाते हैं.

भोजली का या अनोखा त्योहार आधुनिकता की चकाचौध में तेजी से ग्रामीण परम्परा से विलुप्त होता जा रहा है. नई पीढ़ी के लोग इस परंपरा को संजोकर आगे नहीं बढ़ा रहे हैं. बावजूद इसके गांव खेड़े में आज भी भोजली का पर्व बड़ी धूमधाम के साथ मनाया जाता है. लोग बड़े प्यार से एक दूसरे को मितान बनाते हैं और सुख दुख में साथ देने का वादा करते हैं. जांजगीर चांपा में आज भी भोजली के त्योहार पर बेटियां ससुराल से मायके आती हैं और भोजली का त्योहार माता-पिता के घर पर मनाती हैं.

भोजली को माता गंगा के समान पवित्र और पूजनीय माना जाता है. भोजली से जुड़ी कई रोचक मान्यताए भी प्रचलति हैं. बुजुर्गो का मानना है कि पंचमी के दिन से लगाए गए गेहूं के बीच की अच्छे से सेवा करनी चाहिए. जिस टोकरी में गेहूं लगाया गया है उसमें दीपक जलाकर हर दिन पूजा पाठ करना चाहिए, इससे घर में सुख शांति आती है और अन्न का भंडार भरा रहता है. भोजली का त्योहार जल संरक्षण और हरियाली का प्रतीक भी माना जाता है. परंपरा अनुसार भादो माह के प्रथम दिन भोजली का विसर्जन कर अपने दोस्तों और छोटे बड़ों और दुश्मन को भी भोजली भेजी जाती है या दी जाती है. कहते हैं भोजली मिलने पर दुश्मन भी दोस्त बन जाता है.

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