धर्म

देव उठनी ग्यारस 15 नवंबर को….आरंभ होगा शादियों का दौर, बैंड-बाजों, घोड़ियों, टेंट, गार्डन आदि की बुकींग अभी से शुरू…देखे पूरी खबर …

डॉ अनिल तिवारी,जांजगीर, छत्तीसगढ़

 हिंदू पंचांग के अनुसार कार्तिक मास की शुक्ल पक्ष की एकादशी को देवउठनी एकादशी का दिन कहा जाता है। इसे देव प्रबोधिनी एकादशी और देवोत्थान एकादशी भी कहा जाता है। शास्त्रों के अनुसार आषाढ़ शुक्ल पक्ष में एकादशी तिथि को भगवान विष्णु ने शंखासुर राक्षस का वध किया था। जिसे देवशयनी एकादशी के नाम से भी जाना जाता है।
उक्त जानकारी देते हुए ज्योतिष शिरोमणी डॉ अनिल तिवारी ने बताया कि राक्षस के वध के साथ ही भगवान विष्णु चार महीने के लिए योग निद्रा में चले जाते हैं। देवउठनी एकादशी के दिन भगवान विष्णु चार महीने का शयन काल पूरा करने के बाद जागते हैं। पौराणिक मान्यता के अनुसार इसी दिन से विष्णु सृष्टि का कार्यभार संभालते हैं। इस दिन से सभी तरह के मांगलिक कार्य भी शुरू हो जाते हैं। एकादशी के दिन भगवान की पूजा-अर्चना का महत्व है। भगवान विष्णु के शयनकाल के चार मास में विवाह आदि मांगलिक कार्य नहीं होते हैं, लेकिन देवोेत्थान एकादशी के बाद से शुभ और मांगलिक कार्य शुरू हो जाते हैं।. वैसे तो भगवान विष्णु के योग निद्रा .में जाने और उनके जागने को लेकर कई कथाएं हैं, लेकिन इनमें से सबसे प्रचलित कथा लक्ष्मीजी से जुड़ी हुई है। तिथि अनुसार देव उठनी ग्यारस, जिसे छोटा दीपावली भी कहा जाता है 14 नवंबर से है, तो शास्त्रों और ज्योतिषों के अनुसार यह 15 नवंबर को बताई जा रहीं है। इस दिन से जिलेभर में शादियों का दौर आरंभ हो जाएगा। बैंड-बाजों, घोड़ियों, टेंट, गार्डन आदि की बुकींग अभी से शुरू हो गई है।

क्या है मान्यता ? और पूजा विधि
पुराणिक कथा के अनुसार एक बार मां लक्ष्मी ने भगवान विष्णु से पूछा कि हे नाथ! आप दिन-रात जागा करते हैं और जब सोते हैं तो लाखों-करोड़ों वर्ष के लिए सो जाते है। देवउठनी एकादशी के दिन निर्जल या केवल जलीय चीजों पर उपवास रखना चाहिए। रोगी, वृद्ध, बच्चे और व्यस्त लोग केवल एक वेला उपवास रखे। पूजन में सुबह जल्दी उठकर स्नान आदि से निवृत्त हो जाएं। पास के किसी मंदिर में जाकर भगवान के दर्शन कर प्रसाद अर्पित करें। पूजा घर में साफ-सफाई कर दीप प्रज्जवलित करें। देवउठनी एकादशी पर गंगा जल भगवान विष्णु और तुलसी को अर्पित करें। इस दिन व्रत रखने और मंत्र (ऊं नमो भगवते वासुदेवाय) का जाप करें।

क्या नहीं करना चाहिए ?
डॉ अनिल तिवारी के अनुसार विवाह का मुहूर्त 10 नक्षत्रों में नहीं निकालना चाहिए। वहीं सूर्य अगर सिंह राशि में गुरु के नवांश में गोचर करें, तब भी शादी नहीं करना चाहिए। शुक्र पूर्व दिशा में उदित होने के बाद तीन दिवस तक बाल्यकाल में रहते है। इस दौरान वो फल नहीं देते है। इस तरह जब पश्चिम दिशा में होते है, तब 10 दिन तक बाल्यकाल अवस्था होती है। ऐसी स्थिति में विवाह का मुहूर्त निकलवाना सहीं नहीं माना जाता है। वैवाहिक जीवन में मधुरता लाने के लिए शुक्र का शुभ स्थिति में होना जरूरी है। गुरु किसी दिशा में उदित या अस्त हो तब विवाह कार्य संपत्र नहीं करना चाहिए। अगर संतान घर की सबसे बड़ी है। उसका जीवनसाथी भी अपने घर में ज्येष्ठ हो। ऐसे विवाह का मुहूर्त ज्येष्ठ माह में नहीं निकलवाएं।

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