छत्तीसगढ़

कमरछठ 2026 की तारीख और पूजा, मुहूर्त, संतान की लंबी उम्र और सुख-समृद्धि के लिए माताएं रखेंगी व्रत

संतान की लंबी उम्र, अच्छे स्वास्थ्य, सुख-समृद्धि और उनकी रक्षा की कामना को लेकर मनाया जाने वाला पारंपरिक पर्व कमरछठ (हलषष्ठी/हरछठ) इस वर्ष 2 सितंबर, बुधवार को मनाया जाएगा। छत्तीसगढ़ में इस पर्व का विशेष महत्व है। इस दिन माताएं अपनी संतान के सुखी और स्वस्थ जीवन की कामना करते हुए व्रत रखती हैं और विधि-विधान से हलषष्ठी माता की पूजा-अर्चना करती हैं।

संतान की लंबी उम्र के लिए रखा जाता है व्रत

कमरछठ का व्रत मुख्य रूप से माताओं द्वारा अपनी संतानों की लंबी आयु, अच्छे स्वास्थ्य और सुख-समृद्धि के लिए रखा जाता है। मान्यता के अनुसार इस दिन व्रत और पूजा करने से संतान पर आने वाले संकट दूर होते हैं और उन्हें माता का आशीर्वाद प्राप्त होता है। कई स्थानों पर महिलाएं सुबह से व्रत रखकर पूजा के बाद व्रत की कथा सुनती हैं।

भगवान बलराम से जुड़ा है पर्व

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कमरछठ को हलषष्ठी या हलछठ भी कहा जाता है। यह पर्व भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की षष्ठी तिथि को मनाया जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इसी दिन भगवान श्रीकृष्ण के बड़े भाई भगवान बलराम का जन्म हुआ था। भगवान बलराम का प्रमुख शस्त्र हल और मूसल माना जाता है, इसलिए इस पर्व का संबंध कृषि और हल से भी जोड़ा जाता है।

सगरी बनाकर की जाती है पूजा

कमरछठ की पूजा में सगरी का विशेष महत्व होता है। घर के आंगन या पूजा स्थल पर मिट्टी से छोटा सा तालाब या कुएं के आकार की सगरी बनाई जाती है। इसके आसपास झरबेरी, पलाश और कांसी के पौधे लगाए जाते हैं। इसके बाद कलश स्थापित कर हलषष्ठी माता की पूजा की जाती है।

हल से जुते अन्न का नहीं किया जाता सेवन

इस पर्व की एक खास परंपरा यह है कि व्रत के दौरान हल से जुती हुई जमीन में पैदा हुए अन्न का सेवन नहीं किया जाता। महिलाएं पसहर चावल और प्राकृतिक रूप से उगे अन्य खाद्य पदार्थों का उपयोग करती हैं। पूजा में लाई (धान का लावा), महुआ, चना, गेहूं और सतनजा सहित विभिन्न सामग्री अर्पित करने की परंपरा भी है। कई स्थानों पर भैंस के दूध-दही का उपयोग भी किया जाता है।

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पूजा के बाद सुनाई जाती है कमरछठ की कथा

पूजा-अर्चना के बाद महिलाएं एकत्र होकर कमरछठ व्रत की कथा सुनती हैं और हलषष्ठी माता की आरती करती हैं। धार्मिक मान्यताओं और लोककथाओं में इस पर्व को संतान की रक्षा और उनके कल्याण से जोड़ा गया है।

संतान की कमर पर छुआया जाता है हरछठ

पूजा की एक विशेष परंपरा में प्रतीकात्मक रूप से बनाई गई हरछठ को हल्दी मिले पानी में भिगोकर संतान की कमर पर छुआया जाता है। इसे संतान की रक्षा और मंगलकामना का प्रतीक माना जाता है। इसी परंपरा के कारण छत्तीसगढ़ के कई क्षेत्रों में इस पर्व को कमरछठ के नाम से भी जाना जाता है।

छत्तीसगढ़ की लोकपरंपरा में खास महत्व

कमरछठ केवल धार्मिक आस्था का पर्व ही नहीं, बल्कि छत्तीसगढ़ की लोकसंस्कृति और पारंपरिक रीति-रिवाजों से भी गहराई से जुड़ा हुआ है। इस दिन महिलाएं समूह में पूजा करती हैं, व्रत की कथा सुनती हैं और अपनी संतानों के उज्ज्वल भविष्य की कामना करती हैं। ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में भी इस पर्व को लेकर विशेष उत्साह देखने को मिलता है।

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पूजा का शुभ मुहूर्तषष्ठी तिथि प्रारंभ:

2 सितंबर 2026 को सुबह 6:12 बजे सेषष्ठी तिथि समाप्त: 3 सितंबर 2026 को सुबह 4:25 बजे तकप्रातःकाल पूजा मुहूर्त: सुबह 6:12 बजे से 8:10 बजे तकअभिजीत मुहूर्त (दोपहर): दोपहर 12:14 बजे से 1:05 बजे तक

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