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हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: कर्मचारी की सहमति के बिना डेपुटेशन को बताया गलत, लोक अभियोजन उप निदेशक के ट्रांसफर आदेश पर लगाया स्टे

बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि किसी भी शासकीय अधिकारी या कर्मचारी को एक विभाग से दूसरे विभाग में केवल डेपुटेशन के आधार पर और उसकी सहमति से ही भेजा जा सकता है। कोर्ट ने इस सिद्धांत को लागू करते हुए डिप्टी डायरेक्टर, लोक अभियोजन के ट्रांसफर आदेश पर अंतरिम रोक (स्टे) लगा दी है।

मामला बिलासपुर निवासी विवेक त्रिपाठी से जुड़ा है, जो उपनिदेशक, अभियोजन कार्यालय कोरबा में डिप्टी डायरेक्टर के पद पर पदस्थ थे। 24 मार्च 2026 को छत्तीसगढ़ शासन, रायपुर द्वारा उनका स्थानांतरण कोरबा से ईओडब्ल्यू/एसीबी, रायपुर कर दिया गया था। इस आदेश से असंतुष्ट होकर विवेक त्रिपाठी ने अधिवक्ता अभिषेक पाण्डेय और सुंदरा साहू के माध्यम से हाईकोर्ट बिलासपुर में रिट याचिका दायर कर ट्रांसफर आदेश को चुनौती दी।

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याचिकाकर्ता की दलील

याचिकाकर्ता की ओर से प्रस्तुत किया गया कि अभियोजन/गृह विभाग और ईओडब्ल्यू/एसीबी अलग-अलग विभाग एवं कैडर हैं। ऐसे में किसी अधिकारी का सीधे ट्रांसफर नहीं किया जा सकता, बल्कि उसे डेपुटेशन पर भेजा जाना चाहिए, जिसके लिए उसकी सहमति अनिवार्य होती है।

वकीलों ने यह भी बताया कि संबंधित मामले में न तो डेपुटेशन की प्रक्रिया अपनाई गई और न ही अधिकारी की सहमति ली गई। साथ ही, ईओडब्ल्यू/एसीबी में डिप्टी डायरेक्टर का कोई पद रिक्त नहीं है, क्योंकि वहां पहले से अधिकारी कार्यरत हैं।

सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला

याचिका में सुप्रीम कोर्ट के महत्वपूर्ण निर्णयों—प्रसार भारती बनाम अमरजीत सिंह और अन्य तथा सरिता सिंह बनाम इन्फोसाफ्ट प्राइवेट लिमिटेड—का उल्लेख करते हुए कहा गया कि बिना सहमति किसी अधिकारी को डेपुटेशन पर नहीं भेजा जा सकता।

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हाईकोर्ट का आदेश

मामले की सुनवाई के बाद हाईकोर्ट ने याचिका को स्वीकार करते हुए विवेक त्रिपाठी के कोरबा से ईओडब्ल्यू/एसीबी, रायपुर स्थानांतरण आदेश पर स्थगन (स्टे) लगा दिया है। कोर्ट के इस फैसले को शासकीय सेवाओं में डेपुटेशन और ट्रांसफर से जुड़े मामलों में एक महत्वपूर्ण मार्गदर्शक माना जा रहा है।

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